मोदी राजनीति के नए आयाम
मिहिर भोले
कट्टर विरोधियों के बीच जब उनके चाहने वाले उन्हें जाने-अनजाने में एक संत और गुजरात का शेर कह जाते हैं तो छूटते ही अन्य विरोधी उन्हें 'आदमखोर शेर' कह कर पलटवार करते हैं. पार्टी के बाहर उनके आलोचक उन्हें 'मौत का सौदागर' कह डालते हैं तो पार्टी के अन्दर विरोधी उन्हें अक्सर 'तानाशाह' होने का ताना देते हैं. उनकी ही बदौलत देश में कई एनजीओ संचालित '
हेट गुजरात, हेट मोदी' उद्योग फल-फूल रहे हैं जिनकी पूरी कमाई गुजरात दंगे की आग को मीडिया और अन्य मंचों पर सुलगाये रखने से होती है. उर्दू अख़बार नई दुनिया में महज उनका एक साक्षात्कार छापने का खामियाजा संपादक शाहिद सिद्दीकी को अपनी शहादत देकर तब चुकाना पड़ता है जब समाजवादी पार्टी उन्हें इस जुर्म के लिए बाहर का रास्ता दिखा देती है. शाहिद अबतक उस पार्टी की तथाकथित सेकुलर छवि को अपनी मौजूदगी से पुरनूर करते थे. देश से बाहर अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और व्यापारिक निवेश के अवसर के लिए जहाँ वो गुजरात की एक सीइओ की तरह सफल मार्केटिंग कर आते हैं वहीँ देश के अन्दर एक स्टेट्समैन की भाँति भारत के सभी राज्यों के समान आर्थिक विकास के प्रति अपनी कटिबद्धता भी दुहराते हैं. जब देश के लगभग सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल धर्मनिरपेक्षता की गारंटी की दुहाई देकर अपने आर्थिक कार्यक्रमों की विफलता को छुपाने का प्रयास करते हैं, वे अपनी आरोपित सांप्रदायिक छवि के बावजूद औद्योगिक घरानों के सबसे चहेता मुख्यमंत्री बने रहते हैं. जब कई राजनैतिक दल और मीडिया का एक बड़ा अंग उनकी हर पहल को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखना चाहते हैं, कॉर्पोरेट जगत के प्रमुख नरेन्द्र मोदी में देश का नेतृत्व कर पाने की संभावना देखते हैं. बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब वर्तमान सरकार पर देश की अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी से उतार देने का आरोप लगता रहा हो.
पर जहाँ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात विकास की बुलंदियों को छू रहा है, वहीँ देश के भीतर विकास का एक आकांक्षी राज्य बिहार उनसे अपने आर्थिक विकास के लिए किसी प्रकार के सहयोग की संभावना से भी विमुखता का प्रदर्शन करता है. बेरुखी इतनी ज्यादा कि बिहार सरकार, गुजरात सरकार द्वारा भेजी गयी सहायता राशी को लौटाते हुए आनन्-फानन में उनके लिए आयोजित प्रीतिभोज को भी ख़ारिज कर देती है. इतना ही नहीं, बिहार में उनके हर बयान पर कुछ ऐसी उत्तेजित राजनैतिक प्रतिक्रिया जाहिर की जाती है मानो मोदी वहाँ की सरकार की सत्ता को चुनौती दे रहे हों. एक पूर्वोत्तर और एक पश्चिमोत्तर राज्य जो कि एक दूसरे से दो हज़ार किलोमीटर के फासले पर हों और जिनके बीच न तो जल और न ही सीमा और संसाधन सम्बन्धी कोई विवाद हो, उनके बीच इतनी कटुता का स्पष्ट कारण राजनैतिक महत्वाकांक्षा ही हो सकता है, अन्य नहीं. मोदी की तरह नितीश भी भारत के भावी प्रधानमंत्री की तरह देखे जाते हैं. नितीश सरकार की उपलब्धियाँ भी कम नहीं आंकी जा सकतीं. विशेषरूप से बिहार जैसे प्रदेश में लम्बे समय से चले आ रहे जातिवादी ध्रुवीकरण को काबू करने, चरमरायी कानून व्यवस्था को बहाल करने, लम्बे समय से मृतप्राय सरकारी मशीनरी को पुनर्जीवित करने जैसे दुष्कर कार्यों को पूरा करने का बीड़ा उन्होंने उठाया है और सफलता भी पाई है. भ्रष्टाचार से दूरी के मामले में दोनों की छवि अब तक एक जैसी स्वच्छ है.
राजनीति में लम्बी रेस का घोड़ा तो वही बन सकता है जिसमें अपने-आप को समय के मुताबिक ढाल लेने की क्षमता हो और जो आने वाले समय की माँग को समझता हो. प्रधानमंत्री की रेस में कौन जीतेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर आंचलिक क्षत्रपों की भीड़ में यदि इस मानसिकता की होड़ लग जाए तो समझ लीजिये उज्जवल भविष्य के पट खुल गए. bholey.mihir@gmail.com

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