Tuesday, July 31, 2012


मोदी राजनीति के नए आयाम

मिहिर भोले 

ट्टर विरोधियों के बीच जब उनके चाहने वाले उन्हें जाने-अनजाने में एक संत और गुजरात का शेर कह जाते हैं तो छूटते ही अन्य विरोधी उन्हें 'आदमखोर शेर' कह कर पलटवार करते हैं. पार्टी के बाहर उनके आलोचक उन्हें 'मौत का सौदागर' कह डालते हैं तो पार्टी के अन्दर विरोधी उन्हें अक्सर 'तानाशाह' होने का ताना देते हैं. उनकी ही बदौलत देश में कई एनजीओ संचालित ' हेट गुजरात, हेट मोदीउद्योग फल-फूल रहे हैं जिनकी पूरी कमाई गुजरात दंगे की आग को मीडिया और अन्य मंचों पर सुलगाये रखने से होती है. उर्दू अख़बार नई दुनिया में महज उनका एक साक्षात्कार छापने का खामियाजा संपादक शाहिद सिद्दीकी को अपनी शहादत देकर तब चुकाना पड़ता है जब समाजवादी पार्टी उन्हें इस जुर्म के लिए बाहर का रास्ता दिखा देती है. शाहिद अबतक उस पार्टी की तथाकथित सेकुलर छवि को अपनी मौजूदगी से पुरनूर करते थेदेश से बाहर अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और व्यापारिक निवेश के अवसर के लिए जहाँ वो गुजरात की एक सीइओ की तरह सफल मार्केटिंग कर आते हैं वहीँ देश के अन्दर एक स्टेट्समैन की भाँति भारत के सभी राज्यों के समान आर्थिक विकास के प्रति अपनी कटिबद्धता भी दुहराते हैं. जब देश के लगभग सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल धर्मनिरपेक्षता की गारंटी की दुहाई देकर अपने आर्थिक कार्यक्रमों की विफलता को छुपाने का प्रयास करते हैं, वे अपनी आरोपित सांप्रदायिक छवि के बावजूद औद्योगिक घरानों के सबसे चहेता मुख्यमंत्री बने रहते हैं. जब कई राजनैतिक दल और मीडिया का एक बड़ा अंग उनकी हर पहल को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखना चाहते हैं, कॉर्पोरेट जगत के प्रमुख नरेन्द्र मोदी में देश का नेतृत्व कर पाने की संभावना देखते हैं. बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब वर्तमान सरकार पर देश की अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी से उतार देने का आरोप लगता रहा हो

पर जहाँ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात विकास की बुलंदियों को छू रहा है, वहीँ देश के भीतर विकास का एक आकांक्षी राज्य बिहार उनसे अपने आर्थिक विकास के लिए किसी प्रकार के सहयोग की संभावना से भी विमुखता का प्रदर्शन करता है. बेरुखी इतनी ज्यादा कि बिहार सरकार, गुजरात सरकार द्वारा भेजी गयी सहायता राशी को लौटाते हुए आनन्-फानन में उनके लिए आयोजित प्रीतिभोज को भी ख़ारिज कर देती है. इतना ही नहींबिहार में उनके हर बयान पर कुछ ऐसी उत्तेजित राजनैतिक प्रतिक्रिया जाहिर की जाती है मानो मोदी वहाँ की सरकार की सत्ता को चुनौती दे रहे हों. एक पूर्वोत्तर और एक पश्चिमोत्तर राज्य जो कि एक दूसरे से दो हज़ार किलोमीटर के फासले पर हों और जिनके बीच  तो जल और ही सीमा और संसाधन सम्बन्धी कोई विवाद होउनके बीच इतनी कटुता का स्पष्ट कारण राजनैतिक महत्वाकांक्षा ही हो सकता हैअन्य नहीं. मोदी की तरह नितीश भी भारत के भावी प्रधानमंत्री की तरह देखे जाते हैं. नितीश सरकार की उपलब्धियाँ भी कम नहीं आंकी जा सकतीं. विशेषरूप से बिहार जैसे प्रदेश में लम्बे समय से चले रहे जातिवादी ध्रुवीकरण को काबू करने, चरमरायी कानून व्यवस्था को बहाल करने, लम्बे समय से मृतप्राय सरकारी मशीनरी को पुनर्जीवित करने जैसे दुष्कर कार्यों को पूरा करने का बीड़ा उन्होंने उठाया है और सफलता भी पाई है. भ्रष्टाचार से दूरी के मामले में दोनों की छवि अब तक एक जैसी स्वच्छ है

राजनैतिक कारणों से ही सही पर किसी भी अन्य राजनेता के मुकाबले आज मोदी ज्यादा स्पष्ट राष्ट्रव्यापी सोच रखते हैं. कुछ दिनों पहले तक मोदी पाँच करोड़ गुजरातियों की बात करते थे. अब उनका दायरा एक सौ बीस करोड़ भारतीयों तक फ़ैल गया है. शायद इसका आगाज़ उन्होंने गुजरात में बसे लाखों बिहारियों से अपना राफ्ता कायम करके किया है. अभी हाल ही में सूरत और अहमदाबाद में आयोजित बिहार शताब्दी समारोह के वो मुख्य अतिथि थे. इन समारोहों में जहाँ एक ओर नरेन्द्र मोदी को हजारों अप्रवासी बिहारियों के बीच बिहार-ह्रदय सम्राट जैसे संबोधन से सूचित किया गया और उनकी कामयाबी के नारे लगाये गए, वहीँ मोदी ने भी अपनी राजनैतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए गुजरात में बसे लाखों बिहारियों को अपनी कर्मभूमि को अपनी जन्मभूमि की तरह स्वीकार करने का निमंत्रण दिया. हजारों लोगों की उपस्थिति में अहमदाबाद के टैगोर हॉल में जब उन्होंने उमड़ी हुयी भीड़ को देख कर ये कहा कि हमारे घर में जगह कम हो सकती है पर हमारे दिल में आप सबों के लिए बहुत जगह है तो निश्चय ही वो गुजरात से बिहार के लिए एक राजनैतिक सन्देश भी दे रहे थे जिससे बिहारियों के बीच उनकी बढती लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. उन्होंने गुजरात के विकास में गुजराती और बिहारियों के पसीने की मिली-जुली महक होने की बात की. बिहार और  गुजरात के संबंधों को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू की मर्ज़ी के बावजूद सरदार पटेल ने राजेंद्र बाबू को देश का पहला राष्ट्रपति बनवाया. और इसी तर्ज़ पर इमरजेंसी के बाद लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने गुजरात के मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनवाया. लेकिन इन सब से ऊपर उठकर जो कुछ बातें उन्होंने की वो काबिले गौर हैं. उन्होंने देश के विकास के लिए मजबूत और कमजोर राज्यों के बीच में एक ताल-मेल बिठाने की बात की ताकि विकास की दौड़ में कोई भी राज्य पीछे रह जाये. साथ ही उन्होंने हर राज्य की अपनी विशेष ताकत के महत्व की ओर भी इशारा किया जिसे कि राष्ट्रीय हित में इकठ्ठा करने की ज़रुरत है. मोदी ने कहा कि सूरत के हीरा व्यापार की चमक फीकी पड़ जाएगी अगर उसमें बंगाल के कारीगरों का हाथ होऔर यहाँ के कारखानों का उत्पादन कम पड़ जायेगा यदि उत्तर प्रदेश और बिहार के कामगार उसमें अपना श्रमदान दें. निश्चय ही यह सोच 'मराठी मानुस' की विकृत राजनैतिक मानसिकता से बिलकुल अलग है.
राजनीति में लम्बी रेस का घोड़ा तो वही बन सकता है जिसमें अपने-आप को समय के मुताबिक ढाल लेने की क्षमता हो और जो आने वाले समय की माँग को समझता होप्रधानमंत्री की रेस में कौन जीतेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर आंचलिक क्षत्रपों की भीड़ में यदि इस मानसिकता की होड़ लग जाए तो समझ लीजिये उज्जवल भविष्य के पट खुल गए.                            bholey.mihir@gmail.com

No comments:

Post a Comment