Tuesday, August 2, 2016

देश के मुद्दे और मीडिया की जंग
मिहिर भोले

मीडिया की दो दिग्गज हस्तियों बरखा दत्त और अर्नब गोस्वामी के बीच छिड़ी घोषित-अघोषित जंग आज-कल सुर्ख़ियों में है. दोनों ही देश के एकसमान प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रकार हैं. दोनों की अपनी-अपनी फैन-फॉलोइंग है. बरखा लिख रही हैं, अपने लिए वैचारिक समर्थन जुटाने के लिए ट्वीट भी कर रही हैं. दूसरी ओर अर्नब बिना नाम उछाले अपने टेलीविज़न शो में बरखा की सोच का जोरदार प्रतिवाद करते जा रहे हैं. मेन-स्ट्रीम मीडिया की जंग अब सोशल मीडिया तक फ़ैल चुकी है और गंभीर सामाजिक-राजनैतिक एवं राष्ट्रीय हितों से जुड़ी बहस कमेंट्स, लाइक्स और डिसलाइक्स का मोहताज़ हो कर रह गयी है. मीडिया और सोशल-मीडिया एक नए किस्म के प्रजातंत्र को बढ़ावा दे रहा है जिसमें पत्रकार अपने विचारों और पूर्वाग्रहों को सही और दूसरों को गलत ठहराने के लिए प्रतिदिन एक प्रकार का रेफरेंडम करवाते हैं, यह जानते हुए भी कि भारत जैसे विशाल और जटिल देश की समस्याओं का समाधान प्रजातान्त्रिक रूप से हासिल आम सहमति में  है, रेफरेंडम में नहीं. आज के दौर के इंटरऐक्टिव मीडिया ने लोगों को मुखर बनाया है जिसके अपने खतरे भी हैं. इस मुखरता में समझदारी भी है और नासमझी भी. त्वरित कमेंट्स, लाइक्स और डिसलाइक्स के सहारे न तो देश के मुद्दे सुलझाये जा सकते और न ही ठीक-ठीक उसके को मूड समझा जा सकता है. मीडिया के दिग्गज इस मुगालते में न रहें तो बेहतर.

सोशल साइंस रिसर्च की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले किसी व्यक्ति से पूछ कर देखिये कि जल्दीबाजी में पूर्वाग्रहों से ग्रसित कुछ चुनिन्दा लोगों से कुछ चुनिन्दा सवाल पूछ कर अपने मनमाने जवाब पाकर क्या देश के मिजाज़ को सही ढंग से समझा जा सकता है? ये गलती सभी कर रहे हैं. बरखा भी. उनका कहना कि उन्होंने श्रीनगर के अस्पतालों और आर्मी बेस कैंप से रिपोर्टिंग की. यह अपने प्रोफेशन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखलाता है. ऐसी कठिन परिस्थितियों में ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग करना बेशक सराहनीय है. पर क्या महज चंद लोगों से अपने मन की बात कर उसे पूरी सामाजिक सच्चाई बता देना सही होगा? इसपर सभी को गहराई से सोचना होगा. अगर बरखा की श्रीनगर की रिपोर्ट कश्मीर की एक सच्ची तस्वीर दिखाती है तो फिर जी न्यूज़ पर गुरेज के महबूब बेग का टीवी कैमरे पर आकर भारत माता की जयका नारा लगाने को क्या कहेंगे कोरी बकवास?
ये ठीक है कि पत्रकारिता सोशल साइंस रिसर्च नहीं है. उसके सैंपल का आकर छोटा होता है. पर हर बार सैंपल अलग-अलग तो हो ही सकता है? इस बात का क्या औचित्य है कि आज देश के सारे टीवी चैनल चाहे वो कोई भी हों, बार-बार सिर्फ उन्ही गिने-चुने पार्टी प्रवक्ताओं, नेताओं, मौलवियों, साधुओं, ऐक्टिविस्टों, सोशलाइटो को अपने चैनलों पर बुलाते रहें जिनके विचारों को समझने के लिए उनको सुनने की कोई ज़रूरत नहीं, सिर्फ उनके दर्शन ही काफी हैं? क्या देश की सारी समस्याओं की जानकारी और उनके समाधान चंद एंकरों और पैनालिस्ट‍ों के पास है? ये किसकी अभिव्यक्ति है, किसके विचार हैं - एंकरों की, पैनालिस्ट‍ों या दर्शकों की? इस तरीके का इस्तेमाल करना बरखा बखूबी जानती हैं और बाकी सब भी. मीडियम के मेसेज बन जाने के अपने खतरे भी हैं. यह इस बात से स्पष्ट है कि आज आप अखबार, मैगजीन और चैनलों का नाम सुनकर ही ये बता दे सकते हैं कि किसी खास विषय पर उसके विचार क्या होंगे मानो ख़त का मज़मून भाँप लेते हैं लिफ़ाफ़ देख कर. अगर सबकुछ एक फिक्स्ड मैचकी तरह दिखने लगे तो ऐसे में प्रेस की आज़ादी और निष्पक्षता के क्या मायने रह जाते हैं?

तो क्या मीडिया की नज़र में दर्शक या पाठक का रुतबा महज उसके कैप्टिव ऑडीएंसका रह गया है? जनता के सोचने का नजरिया मीडिया क्यों तय करे? वो तो सिर्फ पूरी निष्पक्षता से सच्चाइयों को सबके सामने रखे वही काफी है. देश जानना ज़रूर चाहता है पर अपने तरीके से. हम सामाजिक सच्चाइयों को मीडिया के अलावा अन्य माध्यमों से भी परखते हैं. लोग अगर अर्नब के तर्क और बिना लाग-लपेट के प्रहार करने की शैली को पसंद करते हैं तो उनके इकतरफा प्रलाप और दूसरे पक्ष को सुनने का संयम न रखने की शैली की भी उतनी ही आलोचना करते हैं. भले ही यह उनकी अपनी पसंदीदा स्टाइल हो. मीडिया के अपने पूर्वाग्रह और वैचारिक रुझान होते हैं यह तो स्पष्ट है लेकिन जनता तो सही-गलत दोनों समझती है. ठीक उसी तरह है जैसे गोरक्षा में आस्था रखते हुए भी गोरक्षकों की गैरकानूनी हरकतों को ज्यादातर लोग पसंद नहीं करते. या फिर सेकुलरिज्म में आस्था रखते हुए भी इफ्तार की राजनैतिक पार्टियों में सर पर टोपी और कंधे पर चारखाने का तौलिया डाल शिरकत करने को सेक्युलर और योग दिवस मानाने और भारत माता की जय कहने को कम्युनल करार दिया जाना लोगों को पसंद नहीं. हमें मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था पसंद है पर उससे उभरा पूंजीवादी शोषण पसंद नहीं. उच्च शिक्षण संस्थानों को दी गयी अकादमिक स्वायत्तता हमें ज़रूर चाहिए पर उसकी आड़ में देश के वजूद को खतरे में डालने वाली तथाकथित बौद्धिक आज़ादी हमें मंज़ूर नहीं. अगर मुज़फ्फरनगर जैसे दर्दनाक कांड की निंदा करनी है तो फिर सेकुलर माहौल बनाये रखने के नाम पर मालदा में हुई हिंसा पर मीडिया की चुप्पी को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे कई उदहारण हैं पर हम जानते हैं कि दो गलत मिला के एक सही नहीं बनता. इसलिए ये बहस बेमानी है. प्रश्न ये नहीं है कि बरखा सही हैं या अर्नब या उनके पसंदीदा पैनालिस्ट. प्रश्न ये है कि राजनैतिक पार्टियों की तरह क्या इस देश का मीडिया भी देश और समाज हित में आम सहमति के मुद्दे ढूँढने में असफल हो गया है? राजनैतिक ध्रुवीकरण के बाद क्या मीडिया प्रचारित वैचारिक ध्रुवीकरण देश को इकठ्ठा रख सकेगा? हमारा विरोध राजनैतिक विचारधारा से हो सकता है पर क्या उसे नफरत की उस सीमा तक ले जाना ठीक है जहाँ से लौटना मुश्किल हो? दुर्भाग्यवश सेक्युलर-कम्युनल, सहिष्णु-असहिष्णु, राष्ट्रभक्ति-राष्ट्रद्रोह जैसी बहस को मीडिया ने अपनी राजनैतिक विचारधारा के रंग में रंग दिया है. अब उसके साथ टिके रहना उसकी मजबूरी बन गयी है. मीडिया और पत्रकार अपनी ही बनाई इमेज के शिकार बन चुके हैं. नए विचारों और नज़रियों को जगह देने को वो तैयार ही नहीं, खास कर उन्हें जो उनकी अपनी विचारधारा से मेल न खाते हों. यह चलन अंत में मीडिया को राजनीति का पैरासाइट बना कर रख देगा और तब इस फोर्थ स्टेटकी मजबूत दीवारों को ढहने में कोई वक़्त नहीं लगेगा.


(लेखक नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन के सीनियर फैकल्टी हैं. व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)